इंतज़ार


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पतझड़ सा ये बहार बीता ,
तू क्या जाने,कैसे मेरा इंतज़ार बीता | 
यूँ गुजरा एक एक पल,
जैसे कोई साल बीता | 

कभी हौंसला टूटा  ,कभी  उम्मीदें टूटी
पर प्रेम ,मर मर के भी रहा जीता 
कितना मुश्किल तेरा एतबार बीता | 
यूँ गुजरा एक एक पल,
जैसे कोई साल बीता | 

पढ़ ली कुरान सारी,पढ़ ली पूरी गीता ,
उसकी इनायत हुई ,वस्ल का दिन आया 
नज़र भर तुझको देखा ,
बरसो बाद मेरा इंतज़ार बीता |


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ईद मुबारक




एक माँ की दो संताने ,
एक ही घर मे रहें, हो कर अनजाने |
सब भूल कर आओ ,
हम फिर से प्रेम पहचाने |
चलो फिर से पुराना कल ले आएं,
पुराने प्यार से एक नई रीत बनाये |
स्नेह और भाईचारे की,ये नई रीत मुबारक,
मुझे तुम मुबारक, तुम्हें ईद मुबारक ।

यूँ ही 1

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मैं चाँद भी तोड़ लाउं ,तो तेरे चेहरे पे हँसी नही खिलती
वो दिया भी जला दे ,तो तेरा चेहरा आफताब हो जाय।
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मैं तमाम उम्र कोशिशों में लगा रहा, तेरी आंख का तारा बन पाऊं
ना कभी तेरी निगाह ने सराहा मुझे ,ना मेरी रूह ने ।
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ता उम्र एक मुखोटा पहन के जीय
ना तुझे पता चला न मुझे ।
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जिंदगी तुझे मुझसे कोई शिकायत है तो बता।
आज खुद पर मुक़दमा किया है मैने। 
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लोग

मेरा दिल भी जो नहीं सुन पाता है ,
ज़माने भर को सुना देते हैं लोग | 

किस तरहा हिफाजत करू अपनी ,
सामने बैठ कर,सब कुछ चुरा लेते हैं लोग | 


बस्तियां जलाने पर भी, जब सुकूं  नहीं  मिलता ,
पलकों पर रखे ख्वाब, जला देते हैं लोग | 

जिस को पाने में तमाम उम्र लग जाय किसी की ,
उस चीज को मिटटी बना देते हैं लोग | 

जो बोल कर कह दे बात अपने दिल की 
तो तूफ़ान उठा देते हैं लोग | 

और जो हो जाय खामोश उसे ,
भरी महफ़िल से उठा देते हैं लोग | 

कोई रोया बेबात जी  भर कर , 
कोई नज़र न सोई रात भर ,
सितम कर के कितनी जल्दी ,भुला देते है लोग | 


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तेरा दीद

हाँ किसी मोड़ पर तेरा दीद हो जाय
तो सूखता दरया आँखों का नीला हो जाय।
तुझे जी भर के देखु ,और यू देखूं
के अश्क भी  न निकले और काजल गीला हो जाय।

न तुझे पता चला न मूझे


मेरी ना में भी हाँ थी , तेरी हाँ में भी ना थी,
न तुझे पता चला , न मूझे,
शायद तकदीर का यही इरादा था | 

कुछ देर साथ चले , बस इसी में खुश थे,
ना मेरी दूर तलक की चाहत थी , 
ना तेरा ऐसा वादा था।
न तुझे पता चला , न मूझे,
शायद तकदीर का यही इरादा था | 

तू मेरे बिन खुश है , मैं तेरे बिन खुश हूँ ,
ना मुझे खलिश कोई, ना तुझे गिला कोई,
तेरा मेरा  रिश्ता, 
कितना पाक,कितना सादा था
न तुझे पता चला , न मूझे,
शायद तकदीर का यही इरादा था | 

तू मुझे कुबूल था , मैं तुझे कुबूल थी।
ना मैंने पूछा क्या है , ना तूने बताया ,
ये इश्क़ था ,
तेरा भी आधा था , मेरा भी आधा था
न तुझे पता चला न मूझे
वक़्त का शायद  यही तकाजा था |