मेरी माँ अब बूढ़ी हो चली है
अक्सर बाते भूल जाती है
कही हुई बातो को घंटो दोहराती है
पर आज भी मेरी, उतनी ही चिंता करती है
माँ तुझे नही पता, तू मुझे कितनी अच्छी लगती है|
कभी छोटी छोटी बातो पर, बच्चों की तरह खुश होती है
कभी छोटी छोटी बातो पर गुस्सा करती है
माँ तुझे नही पता, तू मुझे कितनी अच्छी लगती है|
जानती हूँ तुझेे कितना अच्छा लगता है ,जब मैं सज संवर के सूंदर लगती हूँ
जींस टॉप तुझे नही पसंद, बस सलवार कमीज में तुझे मैं जचती हूँ
पर फिर भी ,तू कहने से कितना डरती है
माँ तुझे नही पता, तू मुझे कितनी अच्छी लगती है|
माँ, फ़ोन पर जब तुम खिलखिला के हंसती हो ना,
तो महीनो तक मेरे पीजी (P.G) का ये कमरा ,घर जैसा लगता है
तुझे मेरे बिन घर सुना लगता है ,मुझे तेरे बिन सब सुना लगता है
पर बिना जॉब के भी, कहाँ सरती है
माँ तुझे नही पता ,तू मुझे कितनी अच्छी लगती है|
जब 2-4 रोज के लिय आती हूँ,
बस मेरे इर्द गिर्द मंडराती है,देर रात मुझ से बतियाती है
बालों में तेल लगाती है ,मेरी पसंद का खाना बनाती है
आज भी मुझे ,परियों सा रखती है
माँ तुझे नही पता तू मुझे कितनी अच्छी लगती है|
चुन चुन के सब रख देती है, मेरा बैग फुल कर देती है
फिर कब आओगी पूछ के ,मेरा खाली मन ममता से भर देती है
मेरा बस चले तो यही रुक जाऊ ,तेरा बस चले तो ,तू न जाने दे
आँखें खाली लगती जब तू दरवाजे तक विदा करती है
माँ तुझे नही पता तू मुझे कितनी अच्छी लगती है|
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